-♥️ दुर्गा का छठा स्वरूप:-श्री मां “माँ कात्यायनी” नाम से भी जाना जाता है।
🎈. नवरात्रि का छठा दिन, माता का छठा स्वरूप:-
✨ “माँ कात्यायनी”✨
🎈 कात्यायनी नवदुर्गा या हिन्दू देवी पार्वती (शक्ति) के नौ रूपों में छठा रूप है। स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि ये परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थी, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दिये गये सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया। 🎈 वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतांजलि के महाभाष्य में किया गया है, जिसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में लिखी गयी थी। 🎈 उनका वर्णन देवी-भागवत पुराण, और मार्कंण्डेय ऋषि द्वारा रचित मार्कंण्डेय पुराण के देवी महात्म्य में किया गया है जिसे ४०० से ५०० ईसा में लिपिबद्ध किया गया था। 🎈 बौद्ध और जैन ग्रंथों और कई तांत्रिक ग्रन्थों, विशेष रूप से कालिका-पुराण (१०वीं शताब्दी) में उनका उल्लेख है, जिसमें उद्यान या उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ का स्थान बताया गया है। 🎈 परम्परागत रूप से देवी दुर्गा की तरह वे लाल रंग से जुड़ी हुई हैं। नवरात्रि उत्सव के षष्ठी में उनकी पूजा की जाती है। उस दिन साधक का मन ‘आज्ञा’ चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। 🎈 इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं। 🎈 माँ का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा इसकी भी एक कथा है–कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। 🎈 इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। 🎈 कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। 🎈 महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं। 🎈 ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्त सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था। 🎈 माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। 🎈 माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है।
🎈बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है। माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है। 🎈 नवरात्रि का छठा दिन माँ कात्यायनी की उपासना का दिन होता है। इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है व दुश्मनों का संहार करने में ये सक्षम बनाती हैं। इनका ध्यान गोधुली बेला में करना होता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में छठे दिन इसका जाप करना चाहिए।
🎉 'या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥🎉
अर्थ : हे माँ ! सर्वत्र विराजमान और शक्ति -रूपिणी प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। इसके अतिरिक्त जिन कन्याओ के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो, उन्हें इस दिन माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हे मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है। विवाह के लिये कात्यायनी मन्त्र-
💥 माँ को जो सच्चे मन से याद करता है उसके रोग, शोक, सन्ताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं। जन्म-जन्मान्तर के पापों को विनष्ट करने के लिए माँ की शरणागत होकर उनकी पूजा-उपासना के लिए तत्पर होना चाहिए। ~~~०~~~
चैत्र शुक्ल पक्ष, 30 मार्च 2025 रविवार से माता रानी के चैत्र नवरात्र प्रारंभ हो गये हैं और आप लोगों में से बहुत से भक्त माता के नवरात्र में अखंड ज्योत रखते होंगे।
आइए जानते हैं अखंड ज्योत के कुछ साधारण नियम-:
📌अखंड ज्योत कलश स्थापना के साथ-साथ ही प्रज्वलित कर दें।
🌻अखंड ज्योत के आसपास 9 दिन तक झाड़ू ना निकाले केवल गिले व सूखे कपड़े से सफाई करें।
⛳इस बात का खास ख्याल रखें कि अखंड ज्योति जमीन की बजाय किसी लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़े बिछाकर रखकर जलाएं।
🪴 अखंड ज्योत के दीपक के नीचे चावल जरूर रखे, क्योंकि प्रज्वलित दीपक कभी जमीन पर नहीं रखा जाता।
🕉️अखंड ज्योति को गंदे हाथों से भूलकर भी ना छूएं।
🌹अखंड ज्योति को कभी अकेले ना छोड़े एवं पीठ दिखाकर भी नहीं जायें।
❤️🔥अखंड ज्योति जलाने के लिए भारतीय देसी गाय का शुद्ध देसी घी का प्रयोग करें, क्योंकि गाय का घी सबसे उत्तम और मंगलकारी है।
🩸आप चाहें तो तिल का तेल या फिर सरसों का तेल भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
🌹अगर आप घर में अखंड ज्योति की देखभाल नहीं कर सकते हैं तो आप किसी मंदिर में देसी घी अखंड ज्योति के लिए दान करें।
🐦अखंड ज्योति के लिए रूई की जगह कलावे का इस्तेमाल करें, कलावे की लंबाई इतनी हो कि ज्योति नौ दिनों तक बिना बुझे जलती रहे।
🩸अखंड ज्योति जलाते समय मां दुर्गा, शिव और गणेशजी का ध्यान करें। इस मंत्र का भी जप भी कर सकते हैं-: 🚩ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।"🚩
🪔अखंड ज्योति को मां दुर्गा के दाईं ओर रखा जाना चाहिए., अगर दीपक में सरसों का तेल है तो देवी के बाईं ओर रखें।
🔥ख्याल रखें कि नवरात्रि समाप्त होने पर इसे स्वंय ही समाप्त होने दें कभी भी बुझाने का प्रयास ना करें।
♥️अखंड ज्योत प्रज्वलित करने वाला जातक 9 दिन तक व्रत उपवास करें, सात्विक भोजन करें। स्वच्छता व पवित्रता का ध्यान रखें एवं कम से कम बोले मौन व्रत का पालन करें।। 🕉️🕉️🕉️🕉️ *☠️🐍जय श्री महाकाल सरकार ☠️🐍*🪷* ▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ *♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।* *अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।* *हमारा उद्देश्य मात्र आपको केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।* *राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी संबद्ध विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेवें...* *👉कामना-भेद-बन्दी-मोक्ष* *👉वाद-विवाद(मुकदमे में) जय* *👉दबेयानष्ट-धनकी पुनः प्राप्ति*। *👉*वाणीस्तम्भन-मुख-मुद्रण* *👉*राजवशीकरण* *👉*शत्रुपराजय* *👉*नपुंसकतानाश/ पुनःपुरुषत्व-प्राप्ति* *👉 *भूतप्रेतबाधा नाश* *👉 *सर्वसिद्धि* *👉 *सम्पूर्ण साफल्य हेतु, विशेष अनुष्ठान हेतु। संपर्क करें।* *♥️रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)* *।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।* 🕉️📿🔥🌞🚩🔱🚩🔥🌞
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*🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*
*🎈दिनांक - 02 अप्रैल 2025* *🎈दिन- बुधवार* *🎈 संवत्सर -विश्वावसु* *🎈संवत्सर- (उत्तर) सिद्धार्थी* *🎈विक्रम संवत् - 2082* *🎈अयन - उत्तरायण* *🎈ऋतु - बसन्त* *🎉मास - चैत्र* *🎈पक्ष- शुक्ल* *🎈तिथि - पंचमी रात्रि 11:49:10am तत्पश्चात षष्ठी * *🎈नक्षत्र - कृत्तिका 08:48:47 शाम तत्पश्चात रोहिणी* *🎈योग -आयुष्मान 26:48:43 रात्रि तक, तत्पश्चात सौभाग्य* *🎈करण- बव 13:06:37 अपराहन तत्पश्चात कौलव* *🎈राहु काल_हर जगह का अलग है- सुबह 12:39 से दोपहर 02:12 pm तक* *🎈सूर्योदय - 06:25:50* *🎈सूर्यास्त - 06:51:39 *🎈चन्द्र राशि - वृष* *🎈सूर्य राशि - मीन* *⛅दिशा शूल - उत्तर दिशा में* *⛅ब्राह्ममुहूर्त - प्रातः 04:52 से प्रातः 05:38 तक,* *⛅अभिजीत मुहूर्त - कोई नहीं* *⛅निशिता मुहूर्त - 12:15 ए एम, अप्रैल 03 से 01:01 ए एम, अप्रैल 03तक* *⛅ विशेष- 🎈 पंचम दुर्गा: श्री स्कंदमाता की आराधना की जाती है। *🎈व्रत पर्व विवरण - 👉*⛅ विशेष- * चैत्रीय नवरात्रि,हिन्दू नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं*। जप,तप, पूजन, ध्यान, व्रत माला ९ दिन विशेष रहेगा। *🛟चोघडिया, दिन🛟* रोग 06:27 - 07:59 अशुभ उद्वेग 07:59 - 09:33 अशुभ चर 09:33 - 11:06 शुभ लाभ 11:06 - 12:39 शुभ अमृत 12:39 - 14:12 शुभ काल 14:12 - 15:45 अशुभ शुभ 15:45 - 17:18 शुभ रोग 17:18 - 18:51 अशुभ *🔵चोघडिया, रात🔵 काल 18:51 - 20:18 अशुभ लाभ 20:18 - 21:45 शुभ उद्वेग 21:45 - 23:12 अशुभ शुभ 23:12 - 24:38* शुभ अमृत 24:38* - 26:05* शुभ चर 26:05* - 27:32* शुभ रोग 27:32* - 28:59* अशुभ काल 28:59* - 30:26* अशुभ
🙏♥️:*चैत्रीय नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं*। नवरात्र में शक्ति साधना व कृपा प्राप्ति की सरल पाठ विधि क्या है? -♥️पंचम दुर्गा: श्री स्कंदमाता माँ दुर्गा के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। इन्हें स्कन्द कुमार कार्तिकेय नाम से भी जाना जाता है। यह प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार शौर शक्तिधर बताकर इनका वर्णन किया गया है। इनका वाहन मयूर है अतः इन्हें मयूरवाहन के नाम से भी जाना जाता है। इन्हीं भगवान स्कन्द की माता होने के कारण दुर्गा के इस पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता कहा जाता है। इनकी पूजा नवरात्रि में पांचवें दिन की जाती है। इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में होता है। इनके विग्रह में स्कन्द जी बालरूप में माता की गोद में बैठे हैं। स्कन्द मातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजायें हैं, ये दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान स्कन्द को गोद में पकड़े हैं और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर को उठी है, उसमें कमल पकड़ा हुआ है। माँ का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है और कमल के पुष्प पर विराजित रहती हैं। इसी से इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। मंत्र: सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया | शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ||
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। ध्यान:
(चण्ड और मुण्ड का वध) महर्षि मेधा ने कहा-दैत्यराज की आज्ञा पाकर चण्ड और मुण्ड चतुरंगिनी सेना को साथ लेकर हथियार उठाये हुए देवी से लड़ने के लिए चल दिये। हिमालय पर्वत पर पहुँच कर उन्होंने मुस्कुराती हुई देवी जो सिंह पर बैठी हुई थी देखा, जब असुर उनको पकड़ने के लिए तलवारें लेकर उनकी ओर बढ़े तब अम्बिका को उन पर बड़ा क्रोध आया और मारे क्रोध के उनका मुख काला पड़ गया, उनकी भृकुटियाँ चढ़ गई और उनके ललाट में से अत्यंत भयंकर तथा अत्यंत विस्तृत मुख वाली, लाल आँखों वाली काली प्रकट हुई जो कि अपने हाथों में तलवार और पाश लिये हुए थी, वह विचित्र खड्ग धारण किये हुए थी तथा चीते के चर्म की साड़ी एवं नरमुण्डों की माला पहन रखी थी। उसका माँस सूखा हुआ था और शरीर केवल हड्डियों का ढाँचा था और जो भयंकर शब्द से दिशाओं को पूर्ण कर रही थी, वह असुर सेना पर टूट पड़ी और दैत्यों का भक्षण करने लगी।
वह पार्श्व रक्षकों, अंकुशधारी महावतों, हाथियों पर सवार योद्धाओं और घण्टा सहित हाथियों को एक हाथ से पकड़-2 कर अपने मुँह में डाल रही थी और इसी प्रकार वह घोड़ों, रथों, सारथियों व रथों में बैठे हुए सैनिकों को मुँह में डालकर भयानक रूप से चबा रही थी, किसी के केश पकड़कर, किसी को पैरों से दबाकर और किसी दैत्य को छाती से मसलकर मार रही थी, वह दैत्य के छोड़े हुए बड़े-2 अस्त्र-शस्त्रों को मुँह में पकड़कर और क्रोध में भर उनको दाँतों में पीस रही थी, उसने कई बड़े-2 असुर भक्षण कर डाले, कितनों को रौंद डाला और कितनी उसकी मार के मारे भाग गये, कितनों को उसने तलवार से मार डाला, कितनों को अपने दाँतों से समाप्त कर दिया और इस प्रकार से देवी ने क्षण भर में सम्पूर्ण दैत्य सेना को नष्ट कर दिया।
यह देख महा पराक्रमी चण्ड काली देवी की ओर पलका और मुण्ड ने भी देवी पर अपने भयानक बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी और अपने हजारों चक्र उस पर छोड़े, उस समय वह चमकते हुए बाण व चक्र देवी के मुख में प्रविष्ट हुए इस प्रकार दिख रहे थे जैसे मानो बहुत से सूर्य मेघों की घटा में प्रविष्ट हो रहे हों, इसके पश्चात भयंकर शब्द के साथ काली ने अत्यन्त जोश में भरकर विकट अट्टहास किया। उसका भयंकर मुख देखा नहीं जाता था, उसके मुख से श्वेत दाँतों की पंक्ति चमक रही थी, फिर उसने तलवार हाथ में लेकर “हूँ”शब्द कहकर चण्ड के ऊपर आक्रमण किया और उसके केश पकड़कर उसका सिर काटकर अलग कर दिया, चण्ड को मरा हुआ देखकर मुण्ड देवी की ओर लपखा परन्तु देवी ने क्रोध में भरे उसे भी अपनी तलवार से यमलोक पहुँचा दिया।
चण्ड और मुण्ड को मरा हुआ देखकर उसकी बाकी बची हुई सेना वहाँ से भाग गई। इसके पश्चात काली चण्ड और मुण्ड के कटे हुए सिरों को लेकर चण्डिका के पास गई और प्रचण्ड अट्टहास के साथ कहने लगी-हे देवी! चण्ड और मुण्ड दो महा दैत्यों को मारकर तुम्हें भेंट कर दिया है, अब शुम्भ और निशुम्भ का तुमको स्वयं वध करना है।
महर्षि मेधा ने कहा-वहाँ लाये हुए चण्ड और मुण्ड के सिरों को देखकर कल्याणकायी चण्डी ने काली से मधुर वाणी में कहा-हे देवी! तुम चूँकि चण्ड और मुण्ड को मेरे पास लेकर आई हो, अत: संसार में चामुण्डा के नाम से तुम्हारी ख्याति होगी।नवरात्री के पंचम दिवस आदि शक्ति माँ दुर्गा के स्कन्द स्वरूप की उपासना विधि एवं समृद्धि पाने के उपाय 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️
स्कंद माँ का स्वरूप 〰️〰️🔸〰️🔸〰️〰️ आदिशक्ति जगत जननी माँ दुर्गा का पंचम रूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। भगवान स्कन्द कुमार (कार्तिकेय)की माता होने के कारण दुर्गा जी के इस पांचवे स्वरूप को स्कंद माता नाम प्राप्त हुआ है। सिह के आसन पर विराजमान तथा कमल के पुष्प से सुशोभित दो हाथो वाली यशस्विनी देवी स्कन्दमाता शुभदायिनी है। भगवान स्कन्द जी बालरूप में माता की गोद में बैठे होते हैं इस दिन साधक का मन विशुध्द चक्र में अवस्थित होता है। स्कन्द मातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजायें हैं, ये दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान स्कन्द को गोद में पकडे हैं और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर को उठी है, उसमें कमल पकडा हुआ है। माँ का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है और कमल के पुष्प पर विराजित रहती हैं। इसी से इन्हें पद्मासना की देवी और विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है।
माँ स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनकी उपासना करने से साधक अलौकिक तेज की प्राप्ति करता है । यह अलौकिक प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता है। एकाग्रभाव से मन को पवित्र करके माँ की स्तुति करने से दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है। इनकी आराधना से विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। इनकी आराधना से मनुष्य सुख-शांति की प्राप्ति करता है।
श्री स्कन्दमाता की पूजा विधि 〰️〰️🔸〰️🔸〰️🔸〰️〰️ कुण्डलिनी जागरण के उद्देश्य से जो साधक दुर्गा मां की उपासना कर रहे हैं उनके लिए दुर्गा पूजा का यह दिन विशुद्ध चक्र की साधना का होता है। इस चक्र का भेदन करने के लिए साधक को पहले मां की विधि सहित पूजा करनी चाहिए. पूजा के लिए कुश अथवा कम्बल के पवित्र आसन पर बैठकर पूजा प्रक्रिया को उसी प्रकार से शुरू करना चाहिए जैसे आपने अब तक के चार दिनों में किया है फिर इस मंत्र से देवी की प्रार्थना करनी चाहिए ।
मन्त्र 〰️🔸〰️ सिंहासनगता नित्यं पद्याञ्चितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
तदोपरांत पंचोपचार विधि से देवी स्कन्दमाता की पूजा कीजिए। नवरात्रे की पंचमी तिथि को कहीं कहीं भक्त जन उद्यंग ललिता का व्रत भी रखते हैं। इस व्रत को फलदायक कहा गया है। जो भक्त देवी स्कन्द माता की भक्ति-भाव सहित पूजन करते हैं उसे देवी की कृपा प्राप्त होती है। देवी की कृपा से भक्त की मुराद पूरी होती है और घर में सुख, शांति एवं समृद्धि रहती है।
श्री स्कन्दमाता शप्तशती मंत्र 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया । शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ।। या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
श्री स्कन्दमाता कवच 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा। हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥ श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा। सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥ वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता। उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥ इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी। सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥
वात, पित्त, कफ जैसी बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति को स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए और माता को अलसी चढ़ाकर प्रसाद में रूप में ग्रहण करना चाहिए । शास्त्रों में कहा गया है कि इस चक्र में अवस्थित साधक के मन में समस्त ब
🕉️🕉️🕉️🕉️ *☠️🐍जय श्री महाकाल सरकार ☠️🐍*🪷* ▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ *♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।* *अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।* *हमारा उद्देश्य मात्र आपको केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।* *राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी संबद्ध विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेवें...* *👉कामना-भेद-बन्दी-मोक्ष* *👉वाद-विवाद(मुकदमे में) जय* *👉दबेयानष्ट-धनकी पुनः प्राप्ति*। *👉*वाणीस्तम्भन-मुख-मुद्रण* *👉*राजवशीकरण* *👉*शत्रुपराजय* *👉*नपुंसकतानाश/ पुनःपुरुषत्व-प्राप्ति* *👉 *भूतप्रेतबाधा नाश* *👉 *सर्वसिद्धि* *👉 *सम्पूर्ण साफल्य हेतु, विशेष अनुष्ठान हेतु। संपर्क करें।* *♥️रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)* *।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।* 🕉️📿🔥🌞🚩🔱🚩🔥🌞
🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*
🎈दिनांक - 01 अप्रैल 2025* *🎈दिन- मंगलवार* *🎈 संवत्सर -विश्वावसु* *🎈संवत्सर- (उत्तर) सिद्धार्थी* *🎈विक्रम संवत् - 2082* *🎈अयन - उत्तरायण* *🎈ऋतु - बसन्त* *🎉मास - चैत्र* *🎈पक्ष- शुक्ल* *🎈तिथि - चतुर्थी 02:31:52am तत्पश्चात पंचमी * *🎈नक्षत्र - भरणी 11:05:47 शाम तत्पश्चात कृत्तिका* *🎈योग -विश्कुम्भ 09:46:54 रात्रि तक, तत्पश्चात आयुष्मान* *🎈करण- वणिज 16:03:56 अपराहन तत्पश्चात बव* *🎈राहु काल_हर जगह का अलग है- सुबह 08:01 से दोपहर 09:34 pm तक* *🎈सूर्योदय - 06:26:55* *🎈सूर्यास्त - 06:51:08 *🎈 चन्द्र राशि- मेष * *🎈चन्द्र राशि - वृषभ from 16:29:11* *🎈सूर्य राशि - मीन* *⛅दिशा शूल - दक्षिण दिशा में* *⛅ब्राह्ममुहूर्त - प्रातः 04:50 से प्रातः 05:13 तक,* *⛅अभिजीत मुहूर्त - 12:06 पी एम से 12:59 पी एम* *⛅निशिता मुहूर्त - 12:10 ए एम, मई 02 से 12:54 ए एम, मई 02तक* *⛅ विशेष- 🎈 चौथे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। *🎈व्रत पर्व विवरण - 👉*⛅ विशेष- * चैत्रीय नवरात्रि,हिन्दू नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं*। जप,तप, पूजन, ध्यान, व्रत माला ९ दिन विशेष रहेगा। *🛟चोघडिया, दिन🛟* रोग 06:27 - 07:59 अशुभ उद्वेग 07:59 - 09:33 अशुभ चर 09:33 - 11:06 शुभ लाभ 11:06 - 12:39 शुभ अमृत 12:39 - 14:12 शुभ काल 14:12 - 15:45 अशुभ शुभ 15:45 - 17:18 शुभ रोग 17:18 - 18:51 अशुभ *🔵चोघडिया, रात🔵 काल 18:51 - 20:18 अशुभ लाभ 20:18 - 21:45 शुभ उद्वेग 21:45 - 23:12 अशुभ शुभ 23:12 - 24:38* शुभ अमृत 24:38* - 26:05* शुभ चर 26:05* - 27:32* शुभ रोग 27:32* - 28:59* अशुभ काल 28:59* - 30:26* अशुभ
🙏♥️:*चैत्रीय नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं*। नवरात्र में शक्ति साधना व कृपा प्राप्ति की सरल पाठ विधि क्या है? -♥️नवरात्र का महत्व को समझे;-
🌹#चैत्र_नवरात्रि_व्रत_के_लाभ --- हें प्रिये !! #हिन्दू_संस्कृति के अनुसार नववर्ष का शुभारम्भ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से होता है।
इस दिन से #वसंतकालीन_नवरात्र की शुरूआत होती है।
विद्वानों
के मतानुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की समाप्ति के साथ भूलोक के परिवेश
में एक विशेष परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगता हैं जिसके अनेक स्तर और स्वरुप
होते हैं।
इस दौरान ऋतुओं के परिवर्तन के साथ नवरात्रों का त्यौहार
मनुष्य के जीवन में बाह्य और आतंरिक परिवर्तन में एक विशेष संतुलन स्थापित
करने में सहायक होता हैं।
जिस तरह बाह्य जगत में परिवर्तन होता है उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में भी परिवर्तन होता है।
इस
लिए नवरात्र उत्सव को आयोजित करने का उद्देश्य होता हैं की मनुष्य के भीतर
में उपयुक्त परिवर्तन कर उसे बाह्य परिवर्तन के अनुरूप बनाकर उसे स्वयं के
और प्रकृति के बीच में संतुलन बनाए रखना हैं।
नवरात्रों के दौरान किए जाने वाली पूजा-अर्चना, व्रत इत्यादि से पर्यावरण की शुद्धि होती हैं।
उसी के साथ-साथ मनुष्य के शरीर और भावना की भी शुद्धि हो जाती हैं।
क्योंकि व्रत-उपवास शरीर को शुद्ध करने का पारंपरिक तरीका हैं जो प्राकृतिक-चिकित्सा का भी एक महत्वपूर्ण तत्व है।
यही कारण हैं की विश्व के प्राय: सभी प्रमुख धर्मों में व्रत का महत्व हैं।
इसी लिए हिन्दू संस्कृति में युगों-युगों से नवरात्रों के दौरान व्रत करने का विधान हैं।
क्योंकि व्रत के माध्यम से प्रथम मनुष्य का शरीर शुद्ध होता हैं, शरीर शुद्ध हो तो मन एवं भावनाएं शुद्ध होती हैं।
शरीर की शुद्धी के बिना मन व भाव की शुद्धि संभव नहीं हैं।
चैत्र नवरात्रों के दौरान सभी प्रकार के व्रत-उपवास शरीर और मन की शुद्धि में सहायक होते हैं।
नवरात्रों में किये गए व्रत-उपवास का सीधा असर हमारे अच्छे स्वास्थ्य और रोगमुक्ति के लिए भी सहायक होता हैं।
बड़ी धूम-धाम से किया गया नवरात्रों का आयोजन हमें सुखानुभूति एवं आनंदानुभूति प्रदान करता हैं।
मनुष्य के लिए आनंद की अवस्था सबसे अच्छी अवस्था हैं।
जब
व्यक्ति आनंद की अवस्था में होता हैं तो उसके शरीर में तनाव उत्पन्न करने
वाले शूक्ष्म कोष समाप्त हो जाते हैं और जो सूक्ष्म कोष उत्सर्जित होते हैं
वे हमारे शरीर के लिए अत्यंत लाभदायक होते हैं।
जो हमें नई व्याधियों से बचाने के साथ ही रोग होने की दशा में शीघ्र रोगमुक्ति प्रदान करने में भी सहायक होते हैं।
नवरात्र
में #दुर्गासप्तशती को पढने या सुनाने से देवी अत्यंत प्रसन्न होती हैं
ऐसा शास्त्रोक्त वचन हैं सप्तशती का पाठ उसकी मूल भाषा संस्कृति में करने
पर ही पूर्ण प्रभावी होता हैं।
व्यक्ति को #श्रीदुर्गासप्तशती को भगवती दुर्गा का ही स्वरुप समझना चाहिए।
पाठ करने से पूर्व #श्रीदुर्गासप्तशती की पुस्तक का इस मंत्र से पंचोपचारपूजन करें-
मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और मेरे काम-क्रोध इत्यादि शत्रुओं का नाश करो।
विद्वानों
के अनुसार सम्पूर्ण नवरात्रव्रत के पालन में जो लोग असमर्थ हो वह नवरात्र
के सात रात्रि, पांच रात्रि, दो रात्रि और एक रात्रि का व्रत भी करके लाभ
प्राप्त कर सकते हैं।
नवरात्र में नवदुर्गा की उपासना करने से नवग्रहों का प्रकोप शांत होता हैं।
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