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पंचांग - 23-09-2024

 🗓आज का पञ्चाङ्ग🗓
*⛅दिनांक - 23सितम्बर 2024*
*⛅दिन - सोमवार*
*⛅विक्रम संवत् - 2081*

jyotish

*⛅अयन - दक्षिणायन*
*⛅ऋतु - शरद*
*⛅मास - आश्विन*
*⛅पक्ष - कृष्ण*
*⛅तिथि - षष्ठी दोपहर 01:49:48तक तत्पश्चात सप्तमी*
*⛅नक्षत्र - रोहिणी रात्रि 10:06:20 तक तत्पश्चात मृगशिरा*
*⛅योग - सिद्धि रात्रि 03:08:41 सितम्बर 24 तक तत्पश्चात व्यतिपात*
*⛅राहु काल_हर  जगह का अलग है- प्रातः 07:56 से प्रातः 09:26 तक*
*⛅चन्द्र राशि~       वृषभ*
*⛅सूर्य राशि~       कन्या*
*⛅सूर्योदय - 06:25:13*
*⛅सूर्यास्त - 06:18:56
 *⛅चोघडिया, दिन⛅*
अमृत    06:25 - 07:56    शुभ
काल    07:56 - 09:26    अशुभ
शुभ    09:26 - 10:57    शुभ
रोग    10:57 - 12:27    अशुभ
*उद्वेग    12:27 - 13:58    अशुभ*
   *⛅चोघडिया, रात⛅*
चर    18:29 - 19:59    शुभ
रोग    19:59 - 21:28    अशुभ
काल    21:28 - 22:58    अशुभ
लाभ    22:58 - 24:27*    शुभ
उद्वेग    24:27 - 25:57    अशुभ
शुभ    25:57 - 27:26    शुभ
अमृत    27:26 - 28:56 शुभ
चर    28:56 - 30:26    शुभ
*⛅दिशा शूल - पूर्व दिशा में*
*⛅ब्राह्ममुहूर्त - प्रातः 04:49 से 05:37 तक*
*⛅अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 12:03 से दोपहर 12:51 तक*
*⛅निशिता मुहूर्त-  रात्रि 12:03 सितम्बर 24 से  रात्रि 12:51 सितम्बर 24 तक*
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*⛅ व्रत पर्व विवरण - षष्ठी श्राद्ध, रोहिणी व्रत, सर्वार्थ सिद्धि योग (अहोरात्रि), अमृत सिद्धि योग (रात्रि 10:07 से प्रातः 06:29 सितम्बर 24 तक)*
*⛅विशेष - षष्ठी को नीम-भक्षण (पत्ती फल खाने या दातुन मुंह में डालने) से नीच योनियों की प्राप्ति होती है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
गरुड़ पुराण - छठा अध्याय
गरुड़ जी ने कहा - हे केशव :- नरक से आया हुआ जीव माता के गर्भ में कैसे उत्पन्न होता है? वह गर्भवास आदि के दु:खों को जिस प्रकार भोगता है, वह सब भी मुझे बताइए।
भगवान विष्णु ने कहा :- स्त्री और पुरुष के संयोग से जैसे मनुष्य की उत्पत्ति होती है, उसे मैं तुम्हें कहूँगा।

ऋतुकाल के आरंभ के तीन दिनों तक इन्द्र को लगी ब्रह्महत्या का चतुर्थांश रजस्वला स्त्रियों में रहता है, उस ऋतुकाल के मध्य में किये गये गर्भाधान के फलस्वरुप पापात्माओं के देह की उत्पत्ति होती है। रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन रजकी (धोबिन) कहलाती है। नरक से आए हुए प्राणियों की ये तीन माताएँ होती हैं। दैव की प्रेरणा से कर्मानुरोधी शरीर प्राप्त करने के लिये प्राणि पुरुष के वीर्य का आश्रय लेकर स्त्री के उदर में प्रविष्ट होता है। एक रात्रि में वह शुक्राणु कलल के रूप में, पाँच रात्रि में बुदबुद के रूप में, दस दिनों में बेर के समान तथा उसके पश्चात मांस पेशियों से युक्त अण्डाकार हो जाता है।
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एक मास में सिर, दो मास में बाहु आदि शरीर के सभी अंग, तीसरे मास में नख, लोम, अस्थि, चर्म तथा लिंगबोधक छिद्र उत्पन्न होते हैं। चौथे मास में रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्र – ये सात धातुएँ तथा पाँचवें मास में भूख-प्यास पैदा होती है। छठे मास में जरायु में लिपटा हुआ वह जीव माता की दाहिनी कोख में घूमता है और माता के द्वारा खाये-पीये अन्नादि से बढ़े हुए धातुओं वाला वह जन्तु विष्ठा-मूत्र के दुर्गन्धयुक्त गढ्ढे रूप गर्भाशय में सोता है।

वहाँ गर्भस्थ क्षुधित कृमियों के द्वारा उसके सुकुमार अंग प्रतिक्षण बार-बार काटे जाते हैं, जिससे अत्यधिक क्लेश होने के कारण वह जीव मूर्च्छित हो जाता है। माता के द्वारा खाये हुए कड़वे, तीखे, गरम, नमकीन, रूखे तथा खट्टे पदार्थों के अति उद्वेजक संस्पर्श से उसे समूचे अंग में वेदना होती है और जरायु अर्थात झिल्ली से लिपटा हुआ वह जीव आँतों द्वारा बाहर से ढका रहता है।

उसकी पीठ और गरदन कुण्डलाकार रहती है। इस प्रकार अपने अंगों से चेष्टा करने में असमर्थ होकर भी वह जीव पिंजरे में स्थित पक्षी की भाँति माता की कुक्षि में अपने सिर को दबाए हुए पड़ा रहता है। भगवान की कृपा से अपने सैकड़ों जन्मों के कर्मों का स्मरण करता हुआ वह गर्भस्थ जीव लम्बी श्वास लेता है। ऎसी स्थिति में भला उसे कौन सा सुख प्राप्त हो सकता है? मांस-मज्जा आदि सात धातुओं के आवरण में आवृत वह ऋषिकल्प जीव भयभीत होकर हाथ जोड़कर विकल वाणि से उन भगवान की स्तुति करता है, जिन्होंने उसको माता के उदर में डाला है। सातवें महीने के आरंभ से ही सभी जन्मों के कर्मों का ज्ञान हो जाने पर भी गर्भस्थ प्रसूतिवायु के द्वारा चालित होकर वह विष्ठा में उत्पन्न सहोदर (उसी पेट में उत्पन्न अन्य) कीड़े की भाँति एक स्थान पर ठहर नहीं पाता।
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जीव कहता है ;– मैं लक्ष्मी के पति, जगत के आधार, अशुभ का नाश करने वाले तथा शरण में आये हुए जीवों के प्रति वात्सल्य रखने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाता हूँ।
हे नाथ :- आपकी माया से मोहित होकर मैं देह में अहं भाव तथा पुत्र और पत्नी आदि में ममत्वभाव के अभिमान से जन्म-मरण के चक्कर में फँसा हूँ। मैंने अपने परिजनों के उद्देश्य से शुभ और अशुभ कर्म किये, किंतु अब मैं उन कर्मों के कारण अकेला जल रहा हूँ। उन कर्मों के फल भोगने वाले पुत्र-कलत्रादि अलग हो गये। यदि इस गर्भ से निकलकर मैं बाहर आऊँ तो फिर आपके चरणों का स्मरण करुँगा और ऎसा उपाय करूँगा जिससे मुक्ति प्राप्त कर लूँ।

विष्ठा और मूत्र के कुएँ में गिरा हुआ जठराग्नि से जलता हुआ एवं यहाँ से बाहर निकलने की इच्छा करता हुआ मैं कब बाहर निकल पाऊँगा। जिस दीनदयाल परमात्मा ने मुझे इस प्रकार का विशेष ज्ञान दिया है, मैं उन्हीं की शरण ग्रहण करता हूँ जिससे मुझे पुन: संसार के चक्कर में न आना पड़े। अथवा मैं माता के गर्भगृह से कभी भी बाहर जाने की इच्छा नहीं करता क्योंकि बाहर जाने पर पाप कर्मों से पुन: मेरी दुर्गति हो जाएगी। इसलिए यहाँ बहुत दु:ख की स्थिति में रहकर भी मैं खेदरहित होकर आपके चरणों का आश्रय लेकर संसार से अपना उद्धार कर लूँगा।

श्रीभगवान बोले ;– इस प्रकार की बुद्धिवाले एवं स्तुति करते हुए दस मास के ऋषिकल्प उस जीव को प्रसूतिवायु प्रसव के लिये तुरंत नीचे की ओर ढकेलता है। प्रसूतिमार्ग के द्वारा नीचे सिर करके सहसा गिराया गया वह आतुर जीव अत्यन्त कठिनाई से बाहर निकलता है और उस समय वह श्वास नहीं ले पाता है तथा उसकी स्मृति भी नष्ट हो जाती है। पृथ्वी पर विष्ठा और मूत्र के बीच गिरा हुआ वह जीव मल में उत्पन्न कीड़े की भाँति चेष्टा करता है और विपरीत गति प्राप्त करके ज्ञान नष्ट हो जाने के कारण अत्यधिक रुदन करने लगता है।
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गर्भ में, रुग्णावस्था में श्मशान भूमि में तथा पुराण के पारायण या श्रवण के समय जैसी बुद्धि होती है, वह यदि स्थिर हो जाय तो कौन व्यक्ति सांसारिक बन्धन से मुक्त नहीं हो सकता। कर्मभोग के अनन्तर जीव जब गर्भ से बाहर आता है तब उसी समय वैष्णवी माया उस पुरुष को मोहित कर देती है। उस समय माया के स्पर्श से वह जीव विवश होकर कुछ बोल नहीं पाता, प्रत्युत शैशवादि अवस्थाओं में होने वाले दु:खों को पराधीन की भाँति भोगता है।

उसका पोषण करने वाले लोग उसकी स्थिति इच्छा को जान नहीं पाते। अत: प्रत्याख्यान करने में असमर्थ होने के कारण वह अनभिप्रेत अर्थात विपरीत स्थिति को प्राप्त हो जाता है। स्वदज जीवों से दूषित तथा विष्ठा-मूत्र से अपवित्र शय्या पर सुलाए जाने के कारण अपने अंगों को खुजलाने में, आसन से उठने में तथा अन्य चेष्टाओं को करने में वह असमर्थ रहता है। जैसे एक कृमि दूसरे कृमि को काटता है, उसी प्रकार ज्ञानशून्य और रोते हुए उस शिशु की कोमल त्वचा को डाँस, मच्छर और खटमल आदि जन्तु व्यथित करते हैं।

इस प्रकार शैशवावस्था का दु:ख भोगकर वह पौगण्डावस्था में भी दु:ख ही भोगता है। तदनन्तर युवावस्था प्राप्त होने पर आसुरी सम्पत्ति (दम्भ, घमण्द और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता तथा अज्ञान – ये सब आसुरी-सम्पदा लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं) को प्राप्त करता है। तब वह दुर्व्यसनों में आसक्त होकर नीच पुरुषों के साथ संबंध बनाता है और वह कामलम्पट प्राणी शास्त्र तथा सत्पुरुषों से द्वेष करता है।

भगवान की माया रूपी स्त्री को देखकर वह अजितेन्द्रिय पुरुष उसकी भाव भंगिमा से प्रलोभित होकर महामोहरुप अन्धतम में उसी प्रकार गिर पड़ता है जिस प्रकार अग्नि में पतंगा। हिरन, हाथी, पतंगा, भौंरा और मछली – ये पाँचों क्रमश: शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध तथा रस – इन पाँच विषयों में एक-एक में आसक्ति होने के कारण ही मारे जाते हैं, फिर एक प्रमादी व्यक्ति जो पाँचों इन्द्रियों से पाँचों विषयों का भोग करता है, वह क्यों नहीं मारा जाएगा?

अभीप्सित वस्तु की अप्राप्ति की स्थिति में अज्ञान के कारण ही क्रोध हो आता है और शोक को प्राप्त व्यक्ति देह के साथ ही बढ़ने वाले अभिमान तथा क्रोध के कारण वह कामी व्यक्ति स्वयं अपने नाश हेतु दूसरे कामी से शत्रुता कर लेता है। इस प्रकार अधिक बलशाली अन्य कामीजनों के द्वारा वह वैसे ही मारा जाता है जैसे किसी बलवान हाथी से दूसरा हाथी। इस प्रकार जो मूर्ख अत्यन्त दुर्लभ मानव जीवन को विषयासक्ति के कारण व्यर्थ में नष्ट कर लेता है, उससे बढ़कर पापी और कौन होगा?

सैकड़ों योनियों को पार करके पृथ्वी पर दुर्लभ मानव योनि प्राप्त होती है। मानव शरीर प्राप्त होने पर भी द्विजत्व की प्राप्ति उससे भी अधिक दुर्लभ है। अतिदुर्लभ द्विजत्व को प्राप्त कर जो व्यक्ति द्विजत्व की रक्षा के लिये अपेक्षित धर्म-कर्मानुष्ठान नहीं करता, केवल इन्द्रियों की तृप्ति में ही प्रयत्नशील रहता है, उसके हाथ में आया हुआ अमृतस्वरुप वह अवसर उसके प्रमाद से नष्ट हो जाता है। इसके बाद वृद्धावस्था को प्राप्त करके महान व्याधियों से व्याकुल होकर मृत्यु को प्राप्त करके वह पूर्ववत महान दु:खपूर्ण नरक में जाता है। इस प्रकार जन्म-मरण के हेतुभूत कर्मपाशों से बँधे हुए वे पापी मेरी माया से विमोहित होकर कभी भी वैराग्य को प्राप्त नहीं करते। हे तार्क्ष्य ! इस प्रकार मैंने तुम्हें अन्त्येष्टि कर्म से हीन पापियों की नरक गति बतायी, अब आगे और क्या सुनना चाहते हो?
इस प्रकार गरुड़ पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “पापजन्मादिदु:खनिरुपण” नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ


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*🌷~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
*अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।*
*हमारा उद्देश्य मात्र आपको  केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।*
*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी संबद्ध विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेवें...*
*रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश प्रेम शर्मा नागौर (राजस्थान)*
*Mobile. 8387869068*
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